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ओमू ने खुशियां खरीदीं

हरादून लौटते हुए काका ने ओमू को दस रूपये थमाए। काका दफ्तर के किसी काम से ओमू के गांव आए थे
और उसी के घर में उसके परिवार के साथ ठहरे हुए थे। उस दौरान ओमू ने उनकी खूब टहल की थी। उसने उन्हें गांव भर में खूब घुमाया फिराया था। उनके छोटे छोटे काम कर समय पर मदद की थी।
काका को ओमू बहुत पसन्द था। उन्होंने ओमू के पिता से ओमू को अपने साथ देहरादून चलने की बात भी की थी। काका ने कहा था कि वे ओमू को देहरादून के किसी अच्छे विद्यालय में भर्ती करा देंगे और उसके बाद कालेज भी भेजेंगे। काका सम्पन्न थे और उनकी कोई औलाद भी नहीं थी।
ओमू के पिता गांव की ही एक पाठशाला में चौकीदार थे। उन्होंने नम्रता से परन्तु दृढ़ होकर काका की बात का जवाब दिया था। बच्चे की चहकती आवाज़ और खिलखिलाती हंसी के बिना हमारा घर भला घर जैसा कहां रहेगा। नहीं, नहीं हम अपने बेटे के बिना नहीं रह पाएंगे।
ओमू को इससे पहले खर्च करने के लिए दस रूपये कभी नहीं मिले थे… मां! काका ने मुझे दस रूपये दिए। मैं इसका क्या करूं।
अपने लिए कुछ अच्छा सा खरीदो ओमू। शायद तुम्हारे पिताजी रविवार को तुम्हें बाजार ले जाएं वहां से कुछ खरीदने में तुम्हारी मदद करें।
परन्तु उसके पिता ने कहा… नहीं उसे अपने लिए अपनी ही पसन्द का कुछ खरीदने दो। यह उसका पैसा है और उसे जो मन हो वही खरीदना चाहिए।
ओमू बहुत खुश था। वह जो चाहे खरीद सकता था और दस रूपये तो बहुत होते हैं। वह एक पेंसिल खरीदेगा और एक रबड़ खरीदेगा। ठीक वैका ही जैसा उसके दोस्त जीतू के पास है। उसे एक स्केल की भी जरूरत है।
उसके पास स्केल नहीं था इसलिए वह कभी बिल्कुल सीधी लकीरें नहीं खींच पाया।
खुशी से लगभग नाचते हुए ओमू सड़क पर उछलते कूदते चल रहा था। दस रूपए। वह धनवान था। उसने मन ही मन लोकप्रिय फिल्मी गीत की एक धुन गुनगुनाई। बाबूजी को फिल्मी गीत पसंद नहीं थे। अगर वे सुन लेते कि ओमू फिल्मी गीत गा रहा है तो नाराज़ होते थे। उनका कहना था कि हमेशा भजन गाने चाहिए।
चौराहे पर चिथड़ों में लिपटा एक बूढ़ा व्यक्ति कटोरा लिए बैठा भीख मांग रहा था… भगवान के नाम पर इस गरीब बूढ़े को कुछ दे दो। मैं दो दिनों से भूखा हूं।
वहां से गुजर रहे छोटे लड़कों का एक समूह इस पर हंसा और उन्होंने कुछ चुभती हुई सी बात भी कही। बूढ़े व्यक्ति के चेहरे पर आंसू ढलक पड़े। ओमू को वे दिन याद आए जब उसके पिता बीमार थे और उन्हें अस्पताल ले जाना था। उनके लिए दवाएं लानी थीं और उन्हें अलग तरह का भोजन देना था। उस रात उसकी मां बहुत परेशान थीं… ओमू घर में न खाना है, न पैसा। हम क्या करें।
ओमू ने अपनी मां की ओर देखा था और कहा था, मुझे भूख नहीं है मां। राजू की मां ने राजू को दोपहर में ढेर सा खाना दिया था। उसने साथ में मुझे भी खिलाया। अब तो मैं कुछ भी नहीं खा सकता।
क्या सच में तुम्हें भूख नहीं। मां ने फिर पूछा। तुमसे क्या मैं झूठ बोलूंगा। मैं सिर्फ एक गिलास पानी पियूंगा। फिक्र मत करो। सब ठीक हो जाएगा। कल कुछ पैसों का इंतजाम भी कर लेंगे।
वह सोने चला गया परन्तु भूख के मारे पेट परेशान था। उसे अब तक पेट के उस खालीपन और दर्द का एहसास याद है। उसने अपने पैसों को देखा। दस रूपये। हर नोट नया था। वह आराम से उस बूढ़े व्यक्ति को दो रूपये दे सकता है। तब भी उसके पास आठ बचेंगे। आठ रूपयों से वह बहुत सी चीजें खरीद सकता है।
दस मैं से दो रूपये निकालकर उसने बूढ़े वायक्ति की हथेली पर रख दिए। अपने खाने के लिए कुछ खरीद लो बाबा। तुम्हारे पेट में दर्द हो रहा होगा। जब मैं भूखा था मेरे भी हुआ था।
भगवान तुम्हें सुखी रखे बेटा। हां, भूख से मेरे पेट में दर्द हो रहा हे। मगर बहुत कम लोग इस वात की परवाह करते हैं। मैं बूढ़ा और कमजोर हूं। क्या तुम कुछ खरीद कर मुझे खाने के लिए दे सकते हो।
ज़रूर, मैं दौड़कर बाज़ार से तुम्हारे लिए कुछ ला दूंगा।
ओमू बाज़ार की ओर दौड़ गया। वहां पूरी सब्जी की एक दुकान थी। इससे उस वूढ़े आदमी का पेट भर जाएगा, ओमू ने सोचा और एक रूपये पचास पैसे में आठ पूरियां और थोड़ी सब्जी खरीद ली। बूढ़े व्यक्ति के पैसों में से अभी पचास पैसे बचे रह गए थे। अगली दुकान पर एक आदमी गर्म जलेबियां बेच रहा था। ओमू ने पचास पैसे की जलेबिया खरीदीं।
जीते रहो बेटा, जीते रहो। लम्बी उम्र पाओ। भगवान करे तुम बहुत बड़े आदमी बनो। खूब धन कमाओ।
बूढ़ा व्यक्ति जल्दी जल्दी पूरियां व सब्जी गटकने लगा। ओमू ने उसके पास रखा मग उठाया और पास ही लगे नगर निगम के नल से उसमें पानी भर कर कटोरे के पास ही रख दिया।
बाबा ये पानी है, ओमू ने कहा।
बहुत मेहरबानी बेटा। तुम कितने दयालु हो।
ओमू वहां से दौड़ गया। आठ करारे, नये नोट।
उनका वह क्या करें। वह बाज़ार दौड़ जाए और अपनी पेंसिल, रबड़ खरीद ले। वह और भी बहुत कुछ खरीद सकता है। उसने एक बार चारों ओर नज़र दौड़ाई और बाकी चीजें खरीदने बाज़ार चल पड़ा।
ओमू दोबारा अपनी प्यारी धुन गुनगुनाने लगा। तभी उसका दोस्त राजेन्द्र उसके पास दौड़ता हुआ आया। वह रो रहा था। उसके गालों पर आंसू लगातार लुढ़कते आ रहे थे।
क्या हुआ राजू। ओमू ने पूछा।
मेरा छोटा भाई बीमार है। मेरी मां ने उसकी दवा लाने के लिए मुझे पांच रूपये दिए थे। दवा की दुकान में बहुत भीड़ थी। जब मेरी बारी आई तो देखा कि जेब में रूपये नहीं थे। किसी ने शायद जेब काट ली थी। अब मैं क्या करूं। मेरा भाई बहुत बीमार है। मैं उसके लिए दवा कैसे लाऊंगा। मैंने दुकानदार से हाथ जोड़ कर कहा कि दवा दे दे। मगर उसने बिना पैसे देने से इंकार कर दिया। ओमू, अगर मेरा भाई मर गया तो। उसे बहुत तेज़ बुखार है और वह दर्द से कराह रहा है।
ओमू ने अपनी जेब में करारे नोटों को महसूस किया। अपनी मनचाही सब चीजें वह खरीद पाएगा। मगर राजू का भाई तो बहुत छोटा था। वह बहुत बीमार भी होगा। उसके पिता भी तो अस्पताल में बीमार थे। अगर उस समय पाठशाला के प्रिंसिपल साहब ने उनकी मदद न की होती तो क्या होता। मत रो, राजू। तुम्हारा भाई जरूर ठीक हो जाएगा। ये लो पांच रूपये और जाओ दवा खरीद लो।
राजू की आंखें आश्चर्य से फैल गई।
इतने रूपये तुम्हें कहां से मिले, ओमू।
देहरादून वाले काका यहां कुछ दिन हमारे साथ रहे थे। जाते हुए उन्होंने मुझे दस रूपये दिए।
इन रूपयों से तुम क्या लेना चाहते थे, ओमू। राजेन्द्र ने पूछा।
खास नहीं, कुछ चीजें खरीद लेता। मगर वो इतनी जरूरी भी नहीं हैं। तुम्हारा भाई बीमार है। उसे दवा की जरूरत है।
तुम्हारे पैसे मैं लौटा नहीं पाऊंगा, ओमू। मेरी मां के पास तो देने के लिए रूपये हैं ही नहीं।
कोई बात नहीं राजू तुम दवाएं खरीद लो। तुम्हारा भाई जरूर अच्छा हो जाएगा।
राजू इतना खुश लग रहा था कि ओमू भी उसके साथ मुस्कुरा दिया। अब भी मेरे पास तीन रूपये बचे हुए हैं, उसने मन ही मन सोचा। देखें अब क्या खरीद पाऊंगा। तीन रूपये तो बहुत होते हैं। पर ओमू कुछ उदास सा हो गया। दस रूपये उसे दोबारा कभी नहीं मिलेंगे। उसके पिता उसे इतने रूपये कभी नहीं दे सकेंगे।
ओमू बाज़ार पहुंचा। दुकान में हर तरह की मनभाती चीजें भरी हुई थीं। ओमू उन्हें निहारता हुआ हर दुकान के बाहर धीमे धीमे चलता रहा। वहां उस तरह का स्केल भी था, जैसा उसे चाहिए था। रबड़ और पेंसिल भी वहां थी। वह तीनों खरीद लेगा। तीनों एक-एक रूपये के थे।
एक दुकानदार ने ओमू को रंग बिरंगी पेंसिल, रबड़ आदि को इस तरह ललक के साथ निहारते देखा तो शंका से पूछ बैठा, तुम्हें क्या चाहिए। ओमू, उसे उस तरह का लड़का नहीं लगा था कि कुछ भी खरीदने की हैसियत रखता हो।
ओमू आगे चल दिया। सड़क के अंतिम छोर पर चूड़ियों की एक दुकान थी। सूरज की तेज धूप में कांच की चूड़ियां झिलमिला कर चमक रही थीं। वे रंग बिरंगी और बेहद सुन्दर थीं। उसकी मां की कलाइयां सूनी थीं। काम करते हुए उनकी चूड़ियां चटख गई थीं और पैसे न होने के कारण नई चूड़िया भी नहीं ली जा सकी थीं। दुकान में एक ओर हरे रंग की खूबसूरत चूड़ियां भी थीं, जिनपर सुनहरी मीने का काम था। वे सचमुच बहुत सुन्दर थीं। उसने अपनी मां की कलाइयों में उन चूड़ियों के खनकने की कल्पना की।
ये चूड़ियां कितने की हैं। दो रूपये दर्जन। तुम इनका क्या करोगे।
ये मैं अपनी मां के लिए लूंगा, ओमू ने कहा।
पर मेरे पास तीन रूपये हैं, जबकि मैं उनके लिए दो दर्जन चूड़िया लेना चाहता हूं। मेरी मां बहुत सुन्दर है। ये चू्ड़ियां उनकी कलाइयों पर बहुत प्यारी लगेंगी।
हाथ में तीन रूपये पकड़े हुए ओमू ने चूड़ियों को ललचाती नज़रों से देखा।
दुकानदार के मन में कुछ हुआ। उसने सुनहरी मीने की हरी चू्ड़ियों में से गिनकर दो दर्जन निकाली।
ये बड़ी हैं, अगर हाथ में नाप सही न बैठे तो मैं इन्हें बदल दूंगा।
ओमू ने वह छोटा सा पैकेट संभाला और घर की ओर दौड़ गया। चूड़िया उसकी मां के हाथ के नाप की ही रहीं।
मां तुम कितनी अच्छी लग रही हो। ओमू ने खुश होकर कहा।
मां ने प्यार से उसे गले लगा लिया। और तुमने क्या खरीदा ओमू। अपने लिए तुमने क्या लिया।
मैंने… एक पल को ओमू ठहर गया। फिर पुलक कर बोला, मैंने खुशियां खरीदी। और वह दौड़ गया खेलने के लिए। अपनी वही प्रिय धुन गुनगुनाते हुए।

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